चेन्नई की पेरुंगुडी झील में एक दशक के बाद जलकुंभी का तेजी से फैलाव देखा गया है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और पानी की गुणवत्ता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। PLANET एसोसिएशन के सदस्यों ने मैन्युअल रूप से सफाई अभियान शुरू कर प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

  • पेरुंगुडी झील में 10 वर्षों के बाद जलकुंभी (Water Hyacinth) का भारी प्रसार देखा गया है।
  • प्रदूषित पानी और सीवेज के जमाव को इस संकट का मुख्य कारण माना जा रहा है।
  • मई और जून के दौरान झील में 1,000 से अधिक मछलियों की मौत हो चुकी है।
  • PLANET एसोसिएशन ने नगर निगम और PWD से तत्काल मदद की अपील की है।

चेन्नई के पेरुंगुडी इलाके में स्थित स्थानीय झील एक गंभीर पारिस्थितिक संकट का सामना कर रही है। लगभग एक दशक के लंबे अंतराल के बाद, झील की सतह पर जलकुंभी (Water Hyacinth) का तेजी से विस्तार देखा गया है। इस स्थिति ने PLANET (Perungudi Lake Area Neighbourhood Environment Transformation) एसोसिएशन के सदस्यों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि यह आक्रामक खरपतवार झील के जल स्तर, ऑक्सीजन की मात्रा और समग्र स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर रहा है।

शनिवार को, PLANET के स्वयंसेवकों ने झील की सफाई के लिए एक व्यापक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें उन्होंने मैन्युअल रूप से जलकुंभी को हटाने का प्रयास किया। एसोसिएशन का कहना है कि यह केवल एक सफाई अभियान नहीं है, बल्कि प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है। उन्होंने ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन, लोक निर्माण विभाग (PWD) और जल संसाधन विभाग (WRD) से इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए तत्काल सहायता की मांग की है।

पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव

PLANET के सदस्य शाजू जॉन ने बताया कि जलकुंभी मुख्य रूप से दूषित पानी में पनपती है। यह खरपतवार झील के पानी की गति को रोक रही है, जिससे पानी का ठहराव बढ़ रहा है और घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर तेजी से गिर रहा है। इसके परिणाम स्वरूप, इस वर्ष मई और जून के महीनों के दौरान झील में 1,000 से अधिक मछलियों की मौत हो चुकी है, जो स्थानीय जैव विविधता के लिए एक बड़ा झटका है।

जलकुंभी का प्रसार केवल एक दृश्य समस्या नहीं है, बल्कि यह झील के श्वसन तंत्र को अवरुद्ध कर रहा है, जिससे जलीय जीवन का दम घुट रहा है।

समस्या की जड़ें प्रदूषण और अनियंत्रित शहरीकरण में निहित हैं। बताया जा रहा है कि कुछ घरों का सीवेज एक पुराने तूफानी नाले के माध्यम से सीधे झील में गिर रहा है। इसके अलावा, पास के कल्लूकुट्टई के निवासी और झील के किनारों पर अतिक्रमण करने वाले लोग भी कपड़े धोने और अन्य कार्यों के लिए झील का उपयोग कर रहे हैं, जिससे प्रदूषण का स्तर और बढ़ गया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि शहरी जल निकायों का यह क्षरण केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह शहरी जल प्रबंधन की विफलता का संकेत है। यदि समय रहते वैज्ञानिक बहाली और सीवेज प्रबंधन नहीं किया गया, तो पेरुंगुडी झील एक मृत जलाशय (Dead Lake) में बदल सकती है, जिससे भूजल स्तर और स्थानीय तापमान पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

PLANET के सदस्य प्रेम कुमार ने एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। उन्होंने बताया कि झील का पानी पिछले कुछ समय से भरा हुआ है, जो 2015 की बाढ़ के बाद से लगातार बना हुआ है। उन्हें संदेह है कि हाल ही में लागू की गई एक सरकारी योजना, जिसके तहत उपचारित सीवेज (Treated Sewage) को झील में संग्रहित किया जा रहा है, इस जलकुंभी के विकास का मुख्य कारण हो सकती है।

Did You Know?: जलकुंभी को 'बंगाल का आतंक' भी कहा जाता है क्योंकि यह पानी की सतह को पूरी तरह ढक लेती है और ऑक्सीजन को खत्म कर देती है।

Frequently Asked Questions

1. पेरुंगुडी झील में जलकुंभी क्यों आ रही है?
मुख्य कारण दूषित पानी, सीवेज का सीधा बहाव और उपचारित सीवेज पानी का झील में संग्रहण माना जा रहा है।

2. इस समस्या का मछलियों पर क्या असर हुआ है?
ऑक्सीजन की कमी के कारण इस साल मई और जून में 1,000 से अधिक मछलियाँ मर चुकी हैं।