खाद्य सुरक्षा और पैकेजिंग पर चेतावनी लेबल की कमी पर एक विस्तृत विश्लेषण, जिसमें बताया गया है कि कैसे वैश्विक ब्रांड भारतीय उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ समझौता कर रहे हैं।
- वैश्विक खाद्य ब्रांड कथित तौर पर अन्य बाजारों की तुलना में भारत में चीनी, नमक और वसा की अधिक मात्रा वाले फॉर्मूलेशन का उपयोग कर रहे हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल लागू करने में देरी पर सवाल किया है।
- हैदराबाद की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष ने इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक्स पर भ्रामक लेबल के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और कॉर्पोरेट नैतिकता से जुड़े एक चौंकाने वाले खुलासे में यह बात सामने आई है कि दुनिया के कुछ सबसे बड़े खाद्य और पेय पदार्थ ब्रांड भारतीय बाजार के लिए अपने उत्पादों में बदलाव कर रहे हैं। जांच से पता चला है कि भारत में बेचे जाने वाले उत्पादों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट का स्तर विदेशी बाजारों की तुलना में काफी अधिक है, जबकि स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ कम स्पष्ट हैं।
यह मुद्दा अब भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था तक पहुँच गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) से एक तीखा सवाल पूछा: “क्या आप नहीं चाहते कि लोग स्वस्थ रहें?” अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि नियामक ने उन खाद्य पदार्थों पर सख्त चेतावनी लेबल लागू करने में देरी क्यों की, जिनमें चीनी और नमक की मात्रा अत्यधिक है, खासकर जब यह मामला बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा हो।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक नियामक विफलता नहीं है, बल्कि 'स्वास्थ्य असमानता' का एक व्यवस्थित मुद्दा है। जब वैश्विक निगम विकासशील बाजारों के लिए कम सुरक्षा और पोषण मानक अपनाते हैं, तो यह क्षेत्र में मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संचारी बीमारियों के बोझ को बढ़ाता है। पारदर्शी लेबलिंग की कमी उपभोक्ताओं को सूचित विकल्प चुनने से रोकती है।
"सीमाओं के पार उत्पाद फॉर्मूलेशन में यह अंतर दर्शाता है कि ब्रांडों ने भारतीय आबादी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के बजाय स्वाद और लागत को प्राथमिकता देने का गणनात्मक निर्णय लिया है।"
इस चर्चा में हैदराबाद की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवरंजनी संतोष की भूमिका महत्वपूर्ण है। डॉ. संतोष ने इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक्स पर "ORS" लेबल के भ्रामक उपयोग के खिलाफ आठ साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। कई उच्च-चीनी वाले पेय पदार्थों ने खुद को स्वास्थ्यवर्धक दिखाने के लिए ORS शब्द का उपयोग किया था, जबकि वे निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे थे। उनकी दृढ़ता के कारण अंततः FSSAI ने गैर-अनुपालन उत्पादों के लिए इस शब्द के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत ऐतिहासिक रूप से कुपोषण से लेकर अब मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की महामारी की ओर बढ़ रहा है। FSSAI की स्थापना खाद्य सुरक्षा नियमों को एकीकृत करने के लिए की गई थी, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि उद्योग का दबाव अक्सर सख्त दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन को धीमा कर देता है। फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) की मांग वर्षों से चल रही है, लेकिन कॉर्पोरेट लॉबिंग के कारण इसे लागू करने में देरी हो रही है।
| विशेषता | पश्चिमी बाजार मानक | भारतीय बाजार के रुझान |
|---|---|---|
| चीनी/नमक का स्तर | सख्ती से विनियमित/कम | स्वाद के लिए अक्सर अधिक |
| चेतावनी लेबल | प्रमुख/कुछ यूरोपीय देशों में अनिवार्य | कार्यान्वयन में देरी/कम स्पष्ट |
| फॉर्मूलेशन | स्वास्थ्य-अनुकूलित | लागत और स्वाद-अनुकूलित |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: FOPL क्या है?
FOPL का अर्थ है फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग, जो पैकेज के सामने सरल दृश्य चेतावनियाँ (जैसे लाल बिंदु या प्रतीक) होती हैं ताकि उपभोक्ताओं को उच्च चीनी, नमक या वसा के स्तर के बारे में चेतावनी दी जा सके।
प्रश्न 2: ब्रांड भारत के लिए फॉर्मूलेशन क्यों बदलते हैं?
ब्रांड अक्सर स्थानीय स्वाद की पसंद और सामग्री की लागत के आधार पर रेसिपी बदलते हैं, लेकिन इससे अक्सर उत्पाद का कम स्वास्थ्यवर्धक संस्करण तैयार होता है।