बेंगलुरु के प्रतिष्ठित हरे कृष्णा मंदिर के स्वामित्व को लेकर इस्कॉन बेंगलुरु और इस्कॉन मुंबई के बीच कानूनी जंग जारी है, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट एक नई बेंच बनाने पर विचार कर रहा है।

  • सुप्रीम कोर्ट बेंगलुरु मंदिर के स्वामित्व पर रिव्यू याचिका सुनने के लिए नई बेंच गठित कर सकता है।
  • मामला इस्कॉन बेंगलुरु और इस्कॉन मुंबई के बीच नियंत्रण को लेकर है।
  • इससे पहले जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस मसीह के बीच इस मामले में 'स्प्लिट वर्डिक्ट' (बंटी राय) आया था।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (17 अगस्त, 2026) को बेंगलुरु स्थित प्रतिष्ठित हरे कृष्णा मंदिर और शैक्षिक परिसर के स्वामित्व को लेकर चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस्कॉन मुंबई की उस याचिका पर विचार करने की सहमति जताई है, जिसमें मामले की सुनवाई के लिए एक नई बेंच गठित करने की मांग की गई है।

इस कानूनी विवाद की जड़ें काफी गहरी हैं। मई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस आदेश को पलट दिया था जिसने मंदिर का नियंत्रण इस्कॉन मुंबई को दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय फैसला सुनाया था कि मंदिर का स्वामित्व इस्कॉन बेंगलुरु के पास है, क्योंकि इस्कॉन मुंबई अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका था।

विवाद का मुख्य कारण

यह मामला दो संस्थाओं के बीच है जिनके नाम और आध्यात्मिक मिशन समान हैं। इस्कॉन बेंगलुरु, जो कर्नाटक में पंजीकृत एक सोसाइटी है, का तर्क है कि वह दशकों से स्वतंत्र रूप से मंदिर का प्रबंधन कर रही है। दूसरी ओर, इस्कॉन मुंबई का दावा है कि वह राष्ट्रीय सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत है और बेंगलुरु शाखा केवल उसकी एक उप-इकाई है।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल संपत्ति के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक ट्रस्टों के भीतर प्रशासनिक स्वायत्तता और पंजीकरण कानूनों की जटिलताओं को उजागर करता है। जब एक ही आध्यात्मिक बैनर के तहत अलग-अलग कानूनी संस्थाएं काम करती हैं, तो ऐसे क्षेत्राधिकार विवाद अपरिहार्य हो जाते हैं।

"धार्मिक संस्थानों के बीच स्वामित्व का विवाद अक्सर कानूनी तकनीकीताओं और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की कमी के कारण लंबा खिंचता है, जो अंततः संस्थान की छवि को प्रभावित करता है।"

नवंबर 2025 में, इस मामले में एक विचित्र मोड़ आया जब जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह ने अलग-अलग राय दी। जस्टिस माहेश्वरी ने माना कि रिव्यू याचिका में दम है और इसे खुली अदालत में सुना जाना चाहिए, जबकि जस्टिस मसीह ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है। इस 'स्प्लिट वर्डिक्ट' के कारण मामला अब मुख्य न्यायाधीश के पास दिशा-निर्देशों के लिए भेजा गया है।

पक्ष दावा/तर्क पंजीकरण आधार
इस्कॉन बेंगलुरु स्वतंत्र प्रबंधन और वास्तविक कब्जा कर्नाटक राज्य सोसाइटी
इस्कॉन मुंबई बेंगलुरु मंदिर इसकी एक शाखा है राष्ट्रीय सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860
क्या आप जानते हैं?: बेंगलुरु का इस्कॉन मंदिर न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह अपनी वास्तुकला और शैक्षिक परिसरों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: वर्तमान में मंदिर का नियंत्रण किसके पास है?
मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, मंदिर इस्कॉन बेंगलुरु का है, हालांकि रिव्यू याचिका के कारण कानूनी स्थिति अभी भी चर्चा में है।

प्रश्न 2: 'स्प्लिट वर्डिक्ट' का क्या मतलब है?
जब एक ही बेंच के दो न्यायाधीश एक ही मामले में अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तो उसे स्प्लिट वर्डिक्ट कहा जाता है।