भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी (AAP) की गुजरात इकाई के फेसबुक और इंस्टाग्राम हैंडल को बहाल करने का निर्देश दिया है, जिसे मनमाने ढंग से निलंबित किया गया था।
- सुप्रीम कोर्ट ने आप गुजरात के फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट बहाल करने का आदेश दिया।
- बहाली की शर्त यह है कि यदि कोई आपत्तिजनक पोस्ट है, तो उसे हटाया जाए।
- मुख्य मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।
डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (AAP) की गुजरात इकाई के इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट्स को बहाल करने का निर्देश दिया। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अरढे की पीठ ने पार्टी द्वारा दायर एक अंतरिम आवेदन पर यह आदेश पारित किया।
पार्टी ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर अपने मेटा हैंडल को जियो-ब्लॉक और निलंबित करने के आदेश को "अवैध, मनमाना और असंवैधानिक" बताया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि बिना किसी कारण, सुनवाई या पूर्व सूचना के अकाउंट्स को बंद करना बहुदलीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है और इसका उद्देश्य विपक्षी पार्टी की आवाज को दबाना है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला राज्य-led कंटेंट मॉडरेशन और अनुच्छेद 19 के तहत संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करता है। जब राजनीतिक हैंडल बिना पारदर्शिता के निलंबित किए जाते हैं, तो यह विपक्षी आवाजों को 'डिजिटल रूप से चुप' कराने का एक खतरनाक मिसाल बन जाता है। अदालत की अंतरिम राहत संकेत देती है कि सरकार द्वारा आईटी एक्ट की धारा 69A का उपयोग करते समय सावधानी बरती जानी चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत द्वारा प्रतिनिधित्व करते हुए, आप ने तर्क दिया कि @aapgujarat हैंडल का उपयोग पार्टी की नीतियों और जन कल्याणकारी सूचनाओं के प्रसार के लिए किया जाता था। उन्होंने कहा कि पूरे अकाउंट को ब्लॉक करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक 'पूर्व प्रतिबंध' (prior restraint) है, और इसका औचित्य साबित करने की जिम्मेदारी केंद्र और गुजरात सरकार की है।
बिना उचित प्रक्रिया के किसी राजनीतिक दल के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल को निलंबित करना केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे का संभावित उल्लंघन है।
पार्टी ने अपनी याचिका में कहा कि अकाउंट्स की ब्लॉकिंग असंगत और अत्यधिक थी, जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के दायरे से बाहर है। पार्टी का दावा है कि उन्हें यह तक नहीं बताया गया कि कौन सी सामग्री आपत्तिजनक थी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट ने किस शर्त पर अकाउंट बहाल करने का आदेश दिया?
अदालत ने आदेश दिया कि यदि कोई आपत्तिजनक पोस्ट मौजूद है, तो उसे हटाना होगा, जिसके बाद अकाउंट बहाल किए जाएंगे।
प्रश्न 2: इस कानूनी लड़ाई में अगला कदम क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है, जिसमें निलंबन की वैधता पर विस्तृत चर्चा होगी।