केरल सरकार की 'भूमि सुधार 2.0' पहल के खिलाफ आदिवासी और दलित संगठनों ने अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है। उनका आरोप है कि यह कदम जमीनों को कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में केंद्रित कर सकता है।
- अम्बेडकरवादी डेमोक्रेटिक फ्रंट (ADF) 26 सितंबर को कोट्टायम में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित करेगा।
- आरोप है कि नए सुधारों से 'सामंती-कॉर्पोरेट भूमि स्वामित्व' को बढ़ावा मिलेगा।
- संगठनों का दावा है कि सरकार ने चुनाव पूर्व भूमि वितरण के वादों को भुला दिया है।
केरल में भूमि अधिकारों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अम्बेडकरवादी डेमोक्रेटिक फ्रंट (ADF), जिसमें 50 से अधिक संगठन शामिल हैं, राज्य सरकार की प्रस्तावित 'भूमि सुधार 2.0' (Land Reform 2.0) पहल के खिलाफ एक व्यापक अभियान शुरू करने जा रहा है। इन संगठनों का मानना है कि सरकार की यह योजना वास्तव में भूमि कानूनों को लचीला बनाने की कोशिश है ताकि बड़े कॉर्पोरेट हितों को लाभ पहुँचाया जा सके।
ADF के अध्यक्ष आई.आर. सदानंदन, कार्यकारी अध्यक्ष के. अंबुजक्षण और महासचिव एम. गीतानंदन ने एक संयुक्त बयान में चेतावनी दी है कि यह दूसरा भूमि सुधार राज्य में एक नए प्रकार के 'सामंती-कॉर्पोरेट' स्वामित्व को जन्म दे सकता है। उनका आरोप है कि सरकार ने एक विशेष समूह को ऐसा कानून तैयार करने का काम सौंपा है जो व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए भूमि की पहचान को आसान बनाएगा और वृक्षारोपण मालिकों (Plantation Owners) को पर्यटन और बहु-फसल खेती के नाम पर अपनी जमीनों का उपयोग करने की अधिक स्वतंत्रता देगा।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि गहरा सामाजिक-राजनीतिक है। केरल ने ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील भूमि सुधार किए थे जिन्होंने जमींदारी प्रथा को खत्म किया था। यदि 'भूमि सुधार 2.0' के माध्यम से वृक्षारोपण भूमि को पर्यटन और वाणिज्यिक उपयोग के लिए खोला जाता है, तो यह उन मूल सिद्धांतों को कमजोर करेगा जिन्होंने दलितों और आदिवासियों को सशक्त बनाया था। यह प्रभावी रूप से भूमि के पुन: केंद्रीकरण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
"भूमि सुधारों का उदारीकरण अक्सर हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए भूमिहीनता के नए युग की शुरुआत करता है।"
संगठनों का यह भी आरोप है कि 2026 के विधानसभा चुनावों के दौरान, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने वादा किया था कि वे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कब्जा की गई 5 लाख एकड़ से अधिक वृक्षारोपण भूमि को अधिग्रहित कर भूमिहीनों और आदिवासियों में बांटेंगे। ADF का दावा है कि सत्ता में आने के बाद सरकार ने इन वादों को नजरअंदाज कर दिया और अब वह कानूनों को हल्का करने की कोशिश कर रही है।
आंदोलनकारियों की मांग है कि सरकार अवैध रूप से रखी गई वृक्षारोपण भूमि को अधिग्रहित करे और उसे वास्तव में भूमिहीन लोगों के बीच वितरित करे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे बहु-फसल खेती के खिलाफ नहीं हैं, बशर्ते कि इससे भूमि सीमा (Land Ceiling) के मूल सिद्धांतों और सुधार कानूनों के साथ कोई समझौता न हो।
इस अभियान के तहत 26 सितंबर को कोट्टायम के PWD रेस्ट हाउस में एक सम्मेलन होगा, जिसके बाद पुलिस स्टेशन ग्राउंड पर एक 'फ्रेटरनिटी मीटिंग' आयोजित की जाएगी। इसमें 2003 के मुथंगा भूमि आंदोलन के नेता, जिनमें से कुछ हाल ही में जेल से रिहा हुए हैं, भी शामिल होंगे।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: 'भूमि सुधार 2.0' का विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर: विरोधियों का मानना है कि यह कॉर्पोरेट घरानों को जमीन हड़पने का मौका देगा और भूमिहीन दलितों-आदिवासियों के अधिकारों को खत्म कर देगा।
प्रश्न 2: ADF की मुख्य मांगें क्या हैं?
उत्तर: उनकी मुख्य मांग अवैध वृक्षारोपण भूमि का अधिग्रहण कर उसे भूमिहीनों में बांटना और भूमि सीमा कानूनों को बरकरार रखना है।