मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने स्पष्ट किया है कि मंदिरों में तमिल आध्यात्मिक मंत्रों और ओदुवारों द्वारा तमिल भजनों का गायन पहले से ही लागू है और परंपरा का हिस्सा है। अदालत ने तमिल भजनों को संस्कृत के समान महत्व देने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिल मंत्रों के उपयोग से संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया।
- अदालत ने कहा कि तमिल भजनों का गायन मंदिरों में पहले से ही लागू और प्रचलित है।
- न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत कानून बनाती नहीं, बल्कि उसे लागू करती है।
- मीनाक्षी सुंदरेस्वरर मंदिर के कुंभाभिषेकम से जुड़ी मांगों पर सुनवाई की गई।
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि मंदिरों में ओदुवारों द्वारा तमिल आध्यात्मिक मंत्रों और तमिल भजनों का गायन पहले से ही लागू है और लंबे समय से चलन में है। यह निर्णय मदुरै के प्रसिद्ध श्री मीनाक्षी सुंदरेस्वरर मंदिर के आगामी अनुष्ठानों से संबंधित दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया।
मामले की पहली याचिका तमिल राजेंद्रन (उर्फ आर. राजेंद्रन) द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि श्री मीनाक्षी सुंदरेस्वरर मंदिर के कुंभाभिषेकम के दौरान, यागशाला, गर्भगृह और गोपुर विमानम में संस्कृत के साथ-साथ तमिल आध्यात्मिक मंत्रों और तमिल भजनों का भी समान रूप से उपयोग किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इन अनुष्ठानों में तमिल परंपराओं को संस्कृत के बराबर स्थान मिलना चाहिए।
न्यायालय का रुख और कानूनी सीमाएं
न्यायमूर्ति सी. सरवनन ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि तमिल मंत्रों और ओदुवारों द्वारा भजनों का गायन पहले से ही मंदिरों में मौजूद है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा, "अदालत का उद्देश्य कानून को लागू करना और घोषित करना है, कानून बनाना नहीं।" न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि जब तक इस संबंध में कोई विशिष्ट कानून नहीं बनाया जाता, तब तक याचिकाकर्ता समान स्तर पर मंत्रों के गायन के लिए राहत की मांग नहीं कर सकता।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला धार्मिक परंपराओं और कानूनी ढांचे के बीच के सूक्ष्म अंतर को दर्शाता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि रीति-रिवाजों में बदलाव या नए नियमों की मांग के लिए विधायी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है, न कि केवल न्यायिक हस्तक्षेप की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह कानून निर्माता नहीं है, बल्कि केवल मौजूदा नियमों का व्याख्याता है।
मामले की दूसरी याचिका डी. सुरेशबाबू द्वारा दायर की गई थी। उनकी शिकायत थी कि कुंभाभिषेकम के हिस्से के रूप में वेलवी कुंडम वजीपाडु पूजा (पवित्र अग्नि प्रज्वलित करना) के दौरान तमिल भजनों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सरवनन ने कहा कि जब तक नए नियम नहीं बनाए जाते, तब तक मंदिर का कर्मचारी न होने के नाते कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र रूप से भजनों के गायन की मांग नहीं कर सकता।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह कहकर सांत्वना दी कि वह एक भक्त के रूप में 17 सितंबर को होने वाले कुंभाभिषेकम में भाग ले सकता है। यह निर्णय धार्मिक अनुष्ठानों में प्रशासनिक नियमों की प्रधानता को रेखांकित करता है।Frequently Asked Questions
1. क्या अदालत ने तमिल मंत्रों के उपयोग पर रोक लगाई है?
नहीं, अदालत ने कहा है कि तमिल मंत्रों का उपयोग पहले से ही मंदिरों में प्रचलित है।
2. याचिकाकर्ता क्या मांग कर रहे थे?
याचिकाकर्ता तमिल भजनों को संस्कृत मंत्रों के साथ समान दर्जा देने की मांग कर रहे थे।