बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैन्युअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोने) के मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार की नीति को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को पहले पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देना चाहिए और बाद में संबंधित पक्षों से वसूली करनी चाहिए।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया जो निजी नियोक्ताओं को सीधे मुआवजे के लिए जिम्मेदार बनाती थी।
- अदालत ने आदेश दिया कि राज्य सरकार को पहले मृतकों के आश्रितों को ₹30 लाख का मुआवजा देना होगा।
- न्यायालय ने मैन्युअल स्कैवेंजिंग को जाति-आधारित और मानवीय गरिमा के विरुद्ध बताया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को खारिज कर दिया है, जिसके तहत सफाई कार्यों के दौरान होने वाली मौतों के लिए निजी नियोक्ताओं और हाउसिंग सोसायटियों को सीधे मुआवजे के लिए उत्तरदायी बनाया गया था। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह पहले पीड़ित परिवारों को मुआवजा प्रदान करे और बाद में दोषी पक्षों से उस राशि की वसूली करे।
जाति व्यवस्था और मानवीय गरिमा पर प्रहार
सुनवाई के दौरान अदालत ने देश की सामाजिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, "21वीं सदी में, हम चंद्रमा के दूसरे छोर तक पहुँचने का गर्व करते हैं, फिर भी हमारे सामने एक कड़वी सच्चाई है कि जाति व्यवस्था की सामाजिक बुराई आज भी हमारे देश में कायम है, जो हमारे कुछ नागरिकों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करती है जो मानवीय गरिमा से नीचे हैं।"
अदालत ने आगे कहा कि संविधान समानता की गारंटी देता है, लेकिन संविधान अपनाने के 75 वर्षों के बाद भी भारत इस सामाजिक बुराई से मुक्त नहीं हो पाया है। मैन्युअल स्कैवेंजिंग जैसी प्रथाएं एक विशेष समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से इस अमानवीय कार्य को करने के लिए मजबूर करती हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों और कानूनों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है।
मुआवजे और कानून का कार्यान्वयन
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह छह महीने के भीतर 'खतरनाक सफाई' (Hazardous Cleaning) के दौरान मारे गए सभी लोगों की पहचान करे। 'हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' के तहत, प्रत्येक मृतक के आश्रितों को ₹30 लाख का भुगतान किया जाना अनिवार्य है।
मैन्युअल स्कैवेंजिंग केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जाति आधारित भेदभाव का एक क्रूर स्वरूप है जिसे कानून द्वारा समाप्त किया जाना चाहिए।
BozokMedia विश्लेषण
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यह फैसला न केवल मुआवजे की प्रक्रिया को सरल बनाता है, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े। सरकार द्वारा मुआवजे के भुगतान में देरी करना अब और अधिक कठिन होगा क्योंकि प्राथमिक जिम्मेदारी अब सीधे राज्य पर है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में मैन्युअल स्कैवेंजिंग को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जिनमें 2013 का अधिनियम प्रमुख है। हालांकि, जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन की कमी और सामाजिक संरचना के कारण यह समस्या आज भी बनी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार स्वच्छता कार्यों के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के लिए तत्काल राहत के निर्देश दिए हैं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुआवजे के संबंध में क्या नया निर्देश दिया है?
उत्तर: कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार को पहले परिवारों को मुआवजा देना चाहिए और बाद में निजी संस्थाओं से वसूली करनी चाहिए।
प्रश्न 2: मृतकों के परिवारों को कितनी राशि का हकदार माना गया है?
उत्तर: अदालत ने प्रत्येक मृतक के आश्रितों के लिए ₹30 लाख के मुआवजे का आदेश दिया है।